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Showing posts from December, 2016

तुझसे नाराज नहीं जिन्दगी

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी , हैरान हूँ मैं ओ हैरान हूँ मैं तेरे मासूम सवालों से परेशान हूँ मैं ओ परेशान हूँ मैं जीने के लिये सोचा ही न था , दर्द सम्भालने होंगे मुस्कुराऊँ तो , मुस्कुराने के कर्ज़ उठाने होंगे मुस्कुराऊँ कभी तो लगता है जैसे होंठों पे कर्ज़ रखा है तुझसे ... आज अगर भर आई हैं , बूँदें बरस जायेंगी कल क्या पता इनके लिये आँखें तरस जायेंगी जाने कहाँ गुम कहाँ खोया एक आँसू छुपाके रखा था तुझसे ... ज़िन्दगी तेरे ग़म ने हमें रिश्ते नये समझाये मिले जो हमें धूप में मिले छाँव के ठंडे साये (music for these lines!) ओ तुझसे ...

दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन

दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन -2 बैठे रहे तसव्वुर - ए - जानाँ किये हुए दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन... जाड़ों की नर्म धूप और आँगन में लेट कर -2 आँखों पे खींचकर तेरे आँचल के साए को औंधे पड़े रहे कभी करवट लिये हुए दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन... या गरमियों की रात जो पुरवाईयाँ चलें -2 ठंडी सफ़ेद चादरों पे जागें देर तक तारों को देखते रहें छत पर पड़े हुए दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन... बर्फ़ीली सर्दियों में किसी भी पहाड़ पर -2 वादी में गूँजती हुई खामोशियाँ सुनें आँखों में भीगे भीगे से लम्हे लिये हुए दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन...